Monday, 23 January 2017

डिजिटल तानाशाही से सावधान

"नकदी प्रतिबंध" के माध्यम से डिजिटल अर्थव्यवस्था जबरन लागू करना दुनिया के अरबपतियों द्वारा तकनीकी तानाशाही का एक रूप है
भारत की खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के बचाव को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने से पहले डॉ वन्दना शिवा ने भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की |उन्होंने कई किताबें लिखी हैं और उनके काम के लिये उन्हें कई बार पुरस्कृत किया गया है |
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2017 की शुरुवात के साथ हमारे लिये यह जरूरी हो गया है कि पूरे भारतवर्ष में रातों रात डिजिटल अर्थव्यवस्था लाने की होड़ में हम भारतवासी गिरते -पड़ते जो जिन्दगी जी रहे हैं, उससे कुछ पल के लिये थमकर यह सोंचें कि यह डिजिटल इकॉनॉमी क्या है, किसके नियंत्रण में है ,पश्चिम द्वारा पेटेन्ट किये गये मगर खुद पश्चिम देशों के लोगों के लिये भी हानिकारक सिद्ध हो रहे इस मुद्रा प्रणाली और टेक्नॉलजी के बुनियादी सिद्धान्तों को समझें जो हमारी जिन्दगी और स्वतन्त्रता को एक खास रूप और दिशा में ले जा रही हैं । हमारे विशाल देश और विविधता से परिपूर्ण उसकी प्राचीन सभ्यता को ये अप्रचलित सिस्टम अपने संकीर्ण सांचे में ढालकर हमारे काम करने के तरीकों को, हमारे जीवन की असंख्य खुशियों को संकुचित कर रहा है ।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब सट्टेबाज और बिना मेहनत किये किराया वसूलने वाले करोड़पति बन बैठे हैं । इसी बीच स्वयं-संगठित अर्थव्यवस्थाओं में ( जिन्हें असंगठित और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का गलत नाम दिया गया है) कड़ी मेहनत करने वाले लोग जैसे किसान और अन्य श्रमिक मजदूर जो पहले से ही गरीब थे उन्हें न सिर्फ और अधिक गरीबी में धकेल दिया जा रहा है  बल्कि उनकी स्वयं संगठित आर्थिक प्रणाली को `काला' कहकर उन्हें अपराधी घोषित किया जा रहा है ।
"लंबी अवधि के लाभ के लिए छोटी अवधि में पीड़ा" डिजिटल अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिये जो हुकुम मिला है उसका पालन करने के लिये यह नारा बना दिया गया है । लेकिन यह पीड़ा छोटी अवधि के लिये नहीं है। यह पीड़ा है उन लाखों ईमानदार लोगों की जिन्होंने दिन रात मेहनत करके एक सच्ची अर्थव्यवस्था को बनाये रखने में योगदान दिया है, जो इतने दिनों से एटीएम की लाइनों में खड़े अपने दिन बर्बाद कर रहे हैं, जिसके कारण वह काम पर नहीं जा सकते, रोजगार नहीं मिल रहा है और जीना दूभर हो गया है । गावों में रोज बैंक में हाजिरी देने के लिये मीलों लना आम बात हो गई है जबकि नोटबंदी के पहले बैंक में साल में कुछ ही बार हाजिर होने की जरूरत होती थी ।  
वेनेज़ुएला की सरकार ने जब नोटबंदी की बात की तो वहाँ की जनता ने दंगे फसाद के जरिये यह बता दिया कि उन्हें कतई मंजूर नहीं । इसके विपरीत भारत में हमलोग सहनशीलता से लाइनों में खड़े हैं इस गलत उम्मीद में कि भारत की अर्थ्व्यवस्था का शुद्धीकरण हो जाएगा । अब अर्थव्यव्स्था धुल चुकी और दाग और भी अधिक फैल गये हैं ।
लंबी अवधि के लाभ का आकलन करने के लिये हमें कु्छ बुनियादी सवाल पूछने की जरूरत है - इस तथाकथित लंबी अवधि के लाभ से किसको फायदा होगा?
दुनिया के सबसे अमीर दस अरबपतियों  ने सूचना और नेटवर्क प्रौद्योगिकी के उपकरणों पर एकाधिकार स्थापित करके पैसा बनाया है । इसलिये वह वास्तव में डिजिटल अर्थव्यवस्था का किराया वसूलने वाले हुए जिन्होंने बहुत ही कम समय में बहुत उच्च आवृत्ति पर बड़ी मात्रा में  बहुत सारा कर वसूल लिया है ।
बिल गेट्स और उनके साथियों ने प्रतिभाशाली लोगों द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर पर एकाधिकार बनाकर बड़ी मात्र में पैसे बनाये हैं । वह खुद केवल `कार्यशाला' के मालिक हैं जिसकी छत के नीचे विकास का काम होता है । बिल गेट्स ने इस एकाधिकार को अपने प्रतिद्वंदियों को खत्म करने के लिये इस्तेमाल किया, साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिये कि कम्प्यूटर चाहे जैसा भी हो, आप उसके लिये सिर्फ माइक्रोसॉफ्ट विन्डोज़ की माँग करें । इस समय अगर आपको यह लगे कि `ऐप्पल इन्क का क्या हुआ?' और गूगल पर खोज करें तो जल्दी ही पता चलेगा कि ऐल्फाबेट (गूगल), फेसबुक,ऐमेजॉन, ऐप्पल और माईक्रोसोफ्ट के शेयर वही मुट्ठी भर निजी निवेश कोश (प्राईवेट इन्वेस्टमेन्ट फन्ड्स) के हाथों में है । यह जहाजों का बेड़ा वैनगार्ड इन्क के नेतृत्व में है ।
किसी भी ईमानदार अर्थव्यवस्था में ऐसा व्यवहार गैरकानूनी होगा,लेकिन भारत में हमने इसे `स्मार्ट' का नाम दिया है ।
क्या दोस्त बनाने और उनसे बातें करने के लिये हमे मार्क ज़करबर्ग की जरूरत है ?
नहीं ।
समुदाय और संचार, दोस्ती और सभा - मंडली यह तो समाज का आधार हैं । फेसबुक ने हमें यह सामाजिक नेटवर्क नहीं दिया है ।
मिस्टर ज्यू ने दुनिया के सोशल नेटवर्क को हमलोगों के जरिये इकट्ठा कर लिया है । हमारी दोस्ती - रिश्तेदारियाँ अब `बिग-डेटा' का स्त्रोत बन गई हैं जो कि डिजिटल दुनिया का नया व्यापारिक सामग्री है । सूचना प्रौद्योगिकी  (इनफॉर्मेशन टेक्नॉलजी) हमसे ली हुई जानकारी हमें ही बेचना चाहता है ।
डिजिटलीकरण सभी क्षेत्रों में फैल गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कई बहु-राष्ट्रीय कंपनियाँ अफ्रीका में जीएमओ और जहरीली रसायन खेती, पृथ्वी की जैव विविधता पर पेटेन्ट और नए जीएमओ प्रौद्योगिकी को जबरन लाने की भरसक कोशिश में लगी हैं । बीज हड़पने की उनकी कोशिश को हाल में कैंकून, मेक्सिको में हुए जैव विविधता की सभा में रोक दिया गया ।
ओपेन युनिवर्सिटी में पब्लिक अन्डरस्टैन्डिंग ऑफ टेक्नॉलजी के प्रोफेसर और `फ्रॉम गुटेनबर्ग टू ज़करबर्ग, व्हॉट यू रियली नीड टू नो अबाउट दी इन्टरनेट ' के लेखक जॉन नौटन ने डिजिटल नवाबों को इस युग के डाकू का नाम दिया है ।
जैसा कि उन्होंने कुशाग्रबुद्धि से गार्डियन में कहा - मार्क ज़करबर्ग ने चालाकी से (अपने हार्डवेयर और सोफ्टवेयर के जरिये) 900 मिलियन (90 करोड़ ) ग्राहकों के संचार के बीच खुद को डाल दिया है , इस हद तक कि इससे पहले कि दो लोगों को यह आभास हो कि उनके बीच खास दोस्ती होने वाली है,फेसबुक को यह मालूम हो जाता है । नेटवर्क के स्वभाव के कारण अगर हम सतर्क न रहें तो एक समय ऐसा आ सकता है जब आम लोगों के पास कुछ भी नहीं और सब कुछ इन लोगों के हाथों में होगा - एक वैश्विक किताबों की दुकान, एक सामाजिक नेटवर्क, एक खोज इंजन, एक आनलाइन मल्टीमीडिया स्टोर इत्यादि ।
डिजिटल तानाशाही की स्थापना हो चुकी । हम जितना सवाल कर रहे वह काफी नहीं, समय आ गया है कि हम और अधिक सवाल करें । रुपये और उपकरण साधन होते हैं जिनका उच्च उद्देश्यों के लिये - उदाहरण स्वरूप प्रकृति की देखभाल, लोकहित इत्यादि - जिम्मेदारी और बुद्धिमत्ता के साथ उपयोग करना चाहिये । हमने उन साधनों को ही उद्देश्य बना डाला है और उच्च उद्देश्यों को भूल गये हैं ।
नोटबन्दी के लिये - जिसका वास्तविक उद्देश्य था डिजीटल अर्थव्यवस्था की स्थापना - दो तरह के साधनों का इस्तेमाल किया गया - रुपया और रुपये बनाने के साधन । ये दोनो ही अब एक नया धर्म बन चुके हैं और सरकार की बनायी नीतियाँ अब डिजिटल नवाबों /डाकुओं के डिजिटल अर्थव्यवस्था की स्थापना के सपने को पूरा करने का साधन बन गयी हैं । वरना क्या कारण है कि हर सरकारी विभाग भारतीयों को डिजिटल रूप से शिक्षित करने में अपनी पूरी शक्ति लगा रहा है वैसे समय में जब तकनीकी समाजों में रहने वाले भारत की गूढ़ मान्यताओं के लिये लालायित हैं , उस `वसुधैव कुटुम्बकम' और `सर्वे भवंतु सुखिनः' के ज्ञान के लिये जो हमें सद्भावना और सम्पूर्ण सृष्टि के साथ समरसता सिखाता है? पश्चिम की विखंडित सभ्यता और उसमें एकाकी जीवन जीने पर मजबूर, उदास और हीन आत्माओं से तो हमने कुछ नहीं सीखा । यह डिजिटल अर्थव्यवस्था समाज और लोगों को विखंडित करके उन्हें हीन बनाने का तरीका है जिससे लोगों का आपसी मेल-जोल, सद्भावना खत्म हो जाये और वह साख मुद्रा (क्रेडिट ) के दास बन मात्र उपभोक्ता बनकर रह जायें ।
"नकदी प्रतिबंध" के माध्यम से डिजिटल अर्थव्यवस्था जबरन लागू करना दुनिया के अरबपतियों द्वारा तानाशाही का एक रूप है।
आर्थिक विविधता और तकनीकी बहुलवाद भारत की ताकत हैं और नकद के कारण ही 2008 में वैश्विक बाजार के गिरावट के दौरान भी भारत सुरक्षित रहा ।
महात्मा गाँधी जी का आधिपत्य के प्रति गैर हिंसक विरोध की शिक्षा, स्वतंत्रता के लिये जनता द्वारा बनाई गई और उनके द्वारा प्रबंधित सच्ची, ईमानदार अर्थव्यवस्था की सीख की आज जितनी जरूरत है उतनी कभी नहीं थी । हमारी सामाजिक खुशहाली हमारी सच्ची दौलत है, नकद नहीं है । अपने आप में नकद का कोई मोल नहीं होता । वह मात्र कगज का टुकड़ा होता है जिसपर रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा किया गया वायदा अंकित होता है कि `मैं धारक को -- रुपये देने का वादा करता हूँ ' । इस वादे और भरोसे पर स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की देश की अर्थव्यवस्था टिकी रहती है । इस नोटबंदी के तमाशे ने भारत की अर्थव्यवस्था पर बने उस विश्वास का पर्दाफाश कर दिया ।
डिजिटल अर्थव्यवस्था विश्वसनीय नहीं हो सकती क्योंकि यह वैश्विक बैंकों द्वारा लोगों पर एकतरफा नियंत्रण है , उन लोगों द्वारा जिनके हाथों में डिजिटल नेटवर्क है, और जो चापलूसी से डिजिटल चालों द्वारा रह्स्यमय तरीके से  पैसे बना सकते हैं - जैसे कि वैश्विक विनिमय केन्द्र । वरना वैनगार्ड जैसे मुद्रा कारोबार कोष ( एक्स्चेन्ज ट्रडेड फंड) मोन्सैन्टो से बायर, कोका कोला से पेप्सी, माइक्रोसोफ्ट से फेसबूक, वेल्स फार्गो से टेक्सैको तक सभी मुख्य कोर्पोरेशनों मे सबसे बड़ा निवेशक कैसे होता ?
जब हम हाथों हाथ सौ रुपये का सौ बार भी आदान-प्रदान करते हैं तो वह सौ रुपया ही रहता है । डिजिटल अर्थव्यवस्था में हर लेन-देन पर शुल्क होता है जिससे डिजिटल और वित्तीय नेटवर्क के मालिक पैसा बनाते है । इस तरह से डिजिटल अर्थव्यवस्था ने बिना मेहनत के उन 1 प्रतिशत लोगों को अरबपति बना दिया है जो आज बाकी 99 प्रतिशत लोगों की अर्थव्यवस्था को अपने अधीन कर बैठे हैं ।
सच्ची अतर्थव्यवस्था की नींव है कर्म । जॉम रस्किन और लियो टोल्स्टोय की तरह गांधीजी ने भोजन का प्रबंध जीवन का पोषण करने वाले इस श्रम को "ब्रेड लेबर" यानि "रोटी के लिये श्रम" का नाम दिया । 1921 में उन्होंने `यंग इन्डिया' में लिखा "परमेश्वर ने इन्सान को ऐसा बनाया है कि वह भोजन के लिये काम करे, उनके अनुसार बिना मेहनत किये खाने वाले चोर हैं ।" 1935 में साप्ताहिक पत्रिका "हरिजन" में भोजन के लिये श्रम के बारे अपने विचार को समझाते हुए गाँधीजी ने भगवद्गीता और बाईबल को उद्दृत किया । वह मानते थे कि अहिंसा का कर्म से गहरा संबंध है और "श्रम बिना धन" सात घातक पापों में से एक है ।
सरकार को कागजी नोटों पर नहीं बल्कि जनता को गुलाम बनाने वाली डिजिटल मुद्रा पर रोक लगाना चाहिये ।
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इस ब्लॉग में छपे लेख स्वास्थ्य, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरण और राजनीतिक मुद्दों की समझ उन्नत करने के लिये केवल शैक्षिक उद्देश्यों से उपलब्ध कराए गए हैं ।

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