Wednesday, 31 August 2016

जीएम बीज, कृषि उत्पादकता और राजनीतिक छल - उत्तम भारतीय सनातन खेती को खत्म करने का प्रयास

http://hindi.krishibhoomi.in/Haryana.aspx
ऐतिहासिक तौर पर भारत के किसानों ने दुनिया को यह साबित कर दिखाया था कि चाहे अनाज की जरूरत जितनी भी हो, सब कुछ जैविक और टिकाऊ खेती द्वारा उपजाया जा सकता है और यह काम अनंत काल तक किया जा सकता है । कुदरती खेती करने वाले किसान न सिर्फ हमारा बल्कि धरती की सेहत का भी खयाल रखते हैं । वह पूरे विश्व के अन्नदाता हैं | दुनिया की भूख और भुखमरी का हल उन्हीं के हाथों में है ।
(श्री अरुण श्रीवास्तव ने यह लेख २०१३ में लिखा था जिसे आप अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं --

http://jaagatiduniya.blogspot.co.uk/2016/08/india-genetically-modified-seeds.html )

मनमोहन सिंह और शरद पवार ने जी-एम (जेनेटकली माडिफाइड अर्थात् आनुवांशिक रूप से संशोधित) बीजों पर आधारित जीन क्रांति के माध्यम से उत्पादन में वृद्धि के दोषपूर्ण वैज्ञानिक कल्पना को आगे बढ़ाया है । मोन्सांटो की मनगढ़ंत कहानियों पर उन्हें अटल विश्वास है । दोनों को ही कृषि विज्ञान और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन पढ़ने की जरूरत है मगर समस्या यह है कि वह यह समझ नहीं सकते हैं ।
कुछ उल्लेखनीय अपवादों को छोड़कर ज्यादातर कृ्षि वैज्ञानिक भी नीम हकीमों के जादू के वश में हैं और यह समझते हैं कि हमारे किसान आदिम और अवैज्ञानिक हैं इसलिये उन्हें  `आधुनिक तकनीक’ अपनाना चाहिये ।

असफल हरित क्रांति को जबरन आगे बढ़ाने वाले धोखेबाज अब विफल जीन क्रांति के तकनीकी छल को आगे बढ़ा रहे हैं । वह उन सभी साक्ष्य आधारित विज्ञान को अस्वीकार करते हैं जो नई मनगढ़ंत कहानियों पर टिके उनके अंधे विश्वास को कमजोर करता है । मोन्सांटो के तथाकथित सफलता के पुजारी इन लोगों ने उन जातीय सफाया  (यूजेनिक्स) का समर्थन करने वाले वैज्ञानिकों, सार्वभौमिक रसायन, अन्न और बीज उत्पादकों के सामने मस्तक झुकाना पसंद किया है जिन्होंने अन्न को मानव जाति की पीड़ा और संहार का हथियार बना दिया है । भारतीय पारंपरिक कृषि की निष्पक्ष समीक्षा किये बिना यह लोग भूतपूर्व उपनिवेशवादियों की तरह भारतीय किसानों को बदनाम करते रहते हैं । अगर भारतीय खेती प्रथा वास्तव में `सदियों से गतिहीन’ है और भूख, अपर्याप्त पोषण और गरीबी का कारण थी तो इन वैज्ञानिकों के पूर्वज खत्म हो गये होते ।

ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ और आज के हालात
भारत में ऋग्वेद के दिनों [ ८००० ई.पू से ६००० ई.पू] से अर्थशास्त्र [लगभग ३२० ई.पू] और मध्ययुगीन अवधि के दौरान की कृषि प्रबंधन पर हजारों पाण्डुलिपियाँ हैं मगर अंग्रेज उपनिवेशवादियों ने भूमि प्रबंधन प्रथाओं को समझे बिना बददिमाग वैज्ञानिकों की कहानियों पर ज्यादा भरोसा किया । ब्रिटेन ने अपने भोजन-के-लिये-अन्तहीन-युद्ध की अनंत क्षुधा को तृप्त करर्ने के लिये भारत को सदियों लूटा । नकद के लिये सर्वश्रेष्ठ खेतों में खाद्य फसलों को नष्ट कर अफीम और नील की खेती कराई गयी । कई दशकों तक अनुसंधान और क्षेत्र परीक्षण के बाद ( जिसकी शुरुआत १९०५ में हुई थी) , सर ऐल्बर्ट हावर्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय किसान कुछ भी गलत नहीं कर रहे थे, उनका किया मिट्टी की उर्वरता का प्रबंधन दरअसल बेहतर था । उनका जैविक विधि का समर्थन नये तकनीकों का भय नहीं बल्कि पश्चिम देशों में हो रहे उपज लाभ के बावजूद अजैविक रासायनिक खेती के खिलाफ विज्ञान आधारित विरोध था ।
तालिका १ – १८९० में गेहूँ खेती के मुख्य क्षेत्रों में औसत उपज
देश
भारत
ब्रिटेन
फ्रांस
जर्मनी
रूस
कैनडा
अमेरिका
औस्ट्रेलिया
किलो प्रति हेक्टयर
६४८
१८१४.४
११०१.६
११६६.४
५८३.२
९०७.२
८१०
७१२.८
यूरोप के मुख्य गेहूँ खेती के इलाकों की उपज मध्य उत्तर प्रदेश और गंगा क्षेत्र से कहीं कम थी । १८९० में भारतीय किसान रासायनिक खेती के बिना ब्रिटेन की उपज से दुगुना धान उगा रहे थे और औसत उपज ५६ बुशेल (बुशेल -३२ सेर का तौल) प्रति हेक्टेयर थी । सभी पश्चिमी देशों में भारत के सर्वोतम खेती की उपज के मुकाबले आधे से भी कम उपज होती थी  । जैसा कि १७६०-६४ के ब्रिटिश रिकार्ड्स बताते हैं चेंगलपट्टू इलाके के गांवों मे चावल की पैदावार १२ लाख टन प्रति हेक्टेयर थी ।  क्या यह कृषि वैज्ञानिकों का प्राथमिक काम नहीं था कि १७६० के खेती के अभिलेखों का अद्ययन करें और हजारों साले की मेहनत से हासिल किये इन बेहतरीन तरीकों को अपनायें, जिनके बारे सर हावर्ड ने लिखा कि `महासागरों और अमेरिका के प्रेयरी चारागाह की तरह प्राकृतिक और मौलिक था ? ‘
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन डेटाबेस से   १९६१ को आधार वर्ष मानकर उस दशक में आलू, चावल और गेहूँ की उपज में हुई वृद्धि को तालिक २ में प्रस्तुत है । १९६० के दशक में भारत और चीन में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति की उद्योग कलाओं को अपनाया गया जब पश्चिम देशों को छह दशकों से अधिक का अनुभव प्राप्त हो चुका था । १९६१ तक भारत में भी व्यापक अनुसंधान सुविधाएं आ गईं और आलू, चावल और गेहूँ की खेती में ३१३, २२९ और ३५१ प्रतिशत पैदावार बढ़ी । इस पैदावार की बढ़ोतरी को `पोषण मन्दन प्रभाव’ की तुलना में देखना चाहिये जिसके बारे १९८० के दशक से जानकारी है – उपज लाभ `मन्द पोषण अन्न’ के रूप में बड़ी सामाजिक कीमत पर हासिल हुआ था । तालिका १ और २ के अद्ययन के बाद कुछ विचार :
तालिका २ – प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में उपज [ मेट्रिक टन प्रति हेक्टेयर]
आलू
१९६१
१९७१
१९८१
१९९१
२००१
२०११
प्रतिशत वृद्धि
औस्ट्रेलिया
१२.३३
२०.०५
२४.२४
२८.५४
३२.५५
३५.०९
२८५ %
चीन
९.९२
१०.४८
१०.२८
१०.५७
१३.६८
१६.२८
१६४ %
भारत
७.२५
९.९८
१३.२१
१६.२५
१८.३६
२२.७२
३१३ %
ब्रिटेन
२२.४८
२८.९०
३२.३१
३५.४१
४०.३०
४१.८८
१८६ %
अमेरिका
२२.२०
२५.६०
३०.८२
३४.०६
४०.१८
४२.१७
१९० %
चावल
१९६१
१९७१
१९८१
१९९१
२००१
२०११
प्रतिशत वृद्धि
औस्ट्रेलिया
५.९०
७.३९
७.१७
८.८४
९.२८
९.५४
१६२ %
चीन
२.०८
३.३१
४.३३
५.६२
६.१५
६.६९
३२२ %
भारत
१.५४
१.७१
१.९६
२.६३
३.१२
३.५३
२२९ %
अमेरिका
३.८२
५.२९
५.४०
६.४२
७.२८
७.९२
२०७ %
गेहूँ
१९६१
१९७१
९९८१
१९९१
२००१
२००१
प्रतिशत वृद्धि
औस्ट्रेलिया
१.१३
१.२१
१.३८
१.४७
२.११
२.०३
१८० %
चीन
०.५६
१.२७
२.११
३.१०
३.८१
४.८४
८६५ %
जर्मनी
२.८६
४.४२
४.८८
६.७७
७.८८
७.०२
२४५ %
भारत
०.८५
१.३१
१.६३
२.२८
२.७१
२.९९
३५१ %
ब्रिटेन
३.५४
४.३९
५.८४
७.२५
७.०८
७.७५
२१९ %
अमेरिका
१.६१
२.२८
२.३२
२.३०
२.७०
२.९४
१.८३ %













·      हालाँकि चावल भारत का सबसे महत्वपूर्ण खादान्न है , कृषि वैज्ञानिकों ने उसपर विशेष ध्यान दिया है और १९६१ के बाद भारत में चावल की पैदावार दुगुनी से अधिक हो गई, फिर भी ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और चीन के मुकाबले काफी कम थी ।
·      १९७१ से छहों देशों में गेहूँ की लगातार सबसे कम पैदावार वाला देश ऑस्ट्रेलिया रहा है । भारत की उपज अमेरिका और चीन के मुकाबले में है जबकि ब्रिटेन और जर्मनी अमेरिका से आगे हैं ।
·      अपेक्षाकृत कम उपज के बावजूद अमेरिका और औस्ट्रेलिया दोनों ही देश गेहूँ के प्रमुख निर्यातक हैं जिसका मतलब है वह वास्तव में वैश्विक बाजार के लिये उत्पादन कर रहे हैं । अमेरिका भूराजनीतिक कारणों से चावल का प्रमुख निर्यातक है ।
·      आलू की उपज में भारत में ३१३ % और चीन में १६४ % वृद्धि हुई लेकिन दोनों अब तक अमेरिका, बृटेन और ऑस्ट्रेलिया से पीछे हैं ।
·      गेहूँ के अलावा बाकी तीनों मुख्य फसलों की पैदावार में भारत चीन, ब्रिटेन और अमेरिका से पीछे रहा है ।
आगे यह भी कहा जा सकता है कि  --
·      २०११ में भारत में गेहूँ की औसत पैदावार १८९० के सबसे अच्छे खेतों में हुई पैदावार से कहीं कम है । गेहूँ की पैदावार बढ़ाना वैज्ञानिकों का मुख्य लक्ष्य रहा है, जिसका मतलब है कि उन्होंने इसका कोई सबूत दिये बिना किसानों को लगातार झाँसा दिया है और जनता के पैसे बर्बाद किये हैं ।
·      भारत में चावल की ३.५३ मेट्रिक टन पैदावार १८वीं सदी में बारिश पर आश्रित चेंगलपट्टू में उपजे १२ मेट्रिक टन की तुलना में कुछ भी नहीं है । यहाँ तक कि औस्ट्रेलिया (९.५४ ) और अमेरिका ( ७.९२ मेट्रिक टन) की पैदावार भारत के विगत उपज की तुलना में कहीं कम है । १९७१ में अमेरिका ने ५ लाख टन से अधिक पैदावार किया था जब जीएम बीज उपलब्ध नहीं थे !

एक तरफ जहाँ अयोग्य वैज्ञानिक जनता के पैसों पर आराम करते रहे, भारत के किसान जी तोड़ मेहनत कर देश को खाना खिलाते रहे । कई कट्टरपंथी किसानों ने साधारण दर्जे के खेतों से रिकार्ड (कीर्तिमान) पैदावार हासिल किया है और कई सीमांत पहाड़ी किसानों ने भी अपने खेतों में भारी पैदावार किया है मगर उनके नवाचारों का न तो कोई अध्ययन/जाँच होती है न ही नियोजन अभ्यासों के दौरान जिक्र होता है ।
तालिका ३ वर्तमान पैदावार का एक संछिप्त सारान्श है जो दुनिया को पता होना चाहिये ।
तालिका ३  - किसानो द्वारा स्वच्छंद खेती से कीर्तिमान पैदावार एम-टी या मेट्रिक टन (१००० किलो प्रति हेक्टेयर) में
 फसल
प्रतिहेक्टेयर
       स्थान
उत्पादन विधि
आख्या
चावल
२२.४ एम-टी
नालंदा , बिहार
एस-आर-आई
विश्व रिकार्ड **
गेहूँ
१३.५ एम-टी
नालंदा, बिहार
एस-डबल्यु-आई
न्यूज़ीलैन्ड - १५.६ एम-टी विश्व रिकार्ड 
आलू
७२.९ एम-टी
नालंदा, बिहार
एस-सी-आई
विश्व रिकार्ड **
प्याज
६६.० एम-टी
नालंदा, बिहार
एस-सी-आई
कोरिया -  ६७.०  एम-टी विश्व रिकार्ड
राई
३.० एम-टी
गया, बिहार
एस-सी-आई
३ गुणा वृद्धि
रागी
६.२५ एम-टी
झारखण्ड
एस-सी-आई
संभवतः रिकार्ड उत्पादन
मक्का
३.५ एम-टी
पहाड़ी किसान
एस-सी-आई
६०-७५ % बढ़ोतरी
हल्दी
१-१.५ एम-टी
हिमाचल प्रदेश
प्राकृतिक
सामान्य उत्पादन
स्त्रोत – ऊपर लिखित उपज डेटा मेरे अपने शोध संस्था द्वारा भारत के विभिन्न भागों से प्रकाशित और विधिमान्य तथ्य को स्कैन करके संकलित किया गया है ।एस-आर-आई, एस-डबल्यू-आई और एस-सी-आई जैसे संकेताक्षर बताते हैं कि रसायनों के बिना क्रमशः चावल, गेहूँ और फसल गहनता प्रणाली का इस्तेमाल हुआ है । **  का अर्थ है कि नालंदा जिले के जिला कृषि अधिकारी के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पैदावार की पुष्टि की गयी है ।
१९०५ में जब ऐल्बर्ट हावर्ड भारत आए ओ उन्होंने सबसे पहले यह देखा कि भारतीय कृषि वैज्ञानिक नौकरशाहों की तरह व्यवहार कर रहे हैं । २०१३ में सच्चाई यह है कि भारतीय नौकरशाह सर्वज्ञानी की तरह व्यवहार करते हैं और वैज्ञानिक क्षुद्र नौकरशाहों की तरह पेश आते हैं ।

सच तो यह है कि न तो हरित क्रांति और न ही जीन क्रांति के तकनीकों ने पैदावार इतना बढ़ाया है कि १८वीं और १९वीं सदी के पारंपरिक किसानों की चावल, गेहूँ या अन्य किसी भी फसल के पैदावार की बराबरी कर सके | 

नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिग्लिज़ नालंदा के किसानों से मिले
नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिग्लिज़ ने नालंदा के किसानों को `वैज्ञानिक’ कहा । वह सोहडीह गांव में किसानों से मिले जहाँ २,००० किसान सब्जियाँ उगा रहे हैं और उन्हें हैरत हुई कि पारम्परिक तरीकों से खेती करने के बावजूद उन्हें ऊँची पैदावार मिल रही है । स्टिग्लिज़ राकेश कुमार से भी मिले जो कि उन हजारों में से एक है जिन्होंने २००८-९ में एस-सी-आई विधि को अपनाया । अपनी दो एकड़ की खेत में ७२.९ मेट्रिक टन (लाख टन ) आलू उगाकर राकेश ने विश्व रिकार्ड कायम किया । उनकी प्याज की उपज जो कि ६६ मेट्रिक टन प्रति हेक्टेयर थी कोरिया के किसानों के ६७ मेट्रिक टन प्रति हेक्टेयर के विश्व रिकार्ड के बहुत करीब थी । इसके अलावा  लगभग ४०८० वर्ग फुट (०.०३७ हेक्टेयर) के अपने खेत से राकेश ने ७ से १० मेट्रिक टन हरी सब्जियाँ भी पैदा की । और हर साल पैदावार लगातार बढ़ रही है । एक अन्य किसान सुमंत कुमार ने - जिनकी बारे बहुत कुछ लिखा जा चुका है, २२.४ मेट्रिक टन चावल की खेती कर विश्व रिकार्ड कायम किया है । उनकी मुख्य समस्या अब उगाये खादान्न के लिये यथायोग्य वैज्ञानिक भंडारण की कमी है । ईकोसर्ट (ई-सी-ओ-सी-ई-आर-टी) नामक फ्रेन्च कंपनी ने पैदावार को जैविक प्रमाणित किया है ।

जिला कृषि अधिकारी अफसर (डी-ए-ओ) का कहना है कि २००८ से करीब २५ से ३० हजार किसानों ने एस-सी-आई उत्पादन विधि अपनाया है और यह ‘चालू’ उपज है, ‘वास्तविक’ उपज नहीं । मैनें उनसे पहला प्रश्न यह किया कि उपज कैसे मापा जाता है ? उन्होंने कहा कि अगर खेत १ एकड़ (०.४ हेक्टेयर) से कम हो तो ५० वर्ग मीटर के एक यूनिट को बीच से जाँचा जाता है और उपज को तौल प्रति हेक्टेयर का हिसाब लगाया जाता है । अगर खेत १ एकड़ से अधिक हो तो २-३ युनिट बनाकर जाँच की जाती है । बिहार में ज्यादातर छोटे किसान हैं जिनके पास २ हेक्टेयर से कम जमीन है । डी-ए-ओ ने मुझसे यह भी कहा कि बुआई, देखरेख और कटाई के काम के लिये श्रमिकों को सरकार के खर्च पर रखा गया था । किसानों ने परम्परागत तरीकों से ‘धैंचा’ और गोबर से खेतों को उपजाऊ बनाया और मिट्टी के पोषक स्तर को सर्वोत्कृष्ट रखने के लिये वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) का इस्तेमाल किया । थोड़ी सी प्रतिबद्धता से कृषि विस्तार कितना सफल हो सकता है इसका यह एक उत्तम उदाहरण है ।
मौलिक सिद्धांत यह है कि अगर सिर्फ चावल और गेहूँ को ध्यान में रखा जाये तो यह छोटे किसान लगभग ३० से ३५ लाख टन प्रति हेक्टेयर अनाज का उत्पादन करते हैं ।

एक बात फिर भारतीय किसानों ने यह दिखा दिया कि उपज की अधिकतम सतत सीमा (मैक्सिमम सस्टेनेबल थ्रेशहोल्ड ऑफ ईल्ड) परिवर्तनशील आबोहवा मे लंबी अवधी की औसत उपज है और हरित क्रांति या जीन क्रांति अनावश्यक हैं ।

१७६० के दशक में भारतीय किसान प्रति व्यक्ति १ लाख टन से अधिक अनाज पैदा करते थे । हरित क्रांति के समर्थकों ने प्रति व्यक्ति २०० किलो उपार्जित किया जो कि भुखमरी से मौत को रोकने के लिये  १८८० के दशक में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा परिभाषित न्यूनतम मात्रा है । क्या भारतीय प्रधान मंत्री ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के भुखमरी से मौत को रोकने की न्यूनतम मात्रा की कार्यनीति को लागू कर रहे हैं जैसा कि उनके प्रबंधक प्लानिंग कमीशन के मोन्टेक सिंह आहलूवालिया द्वारा भुखमरी दूर रखने के लिये एक पावरोटी को पर्याप्त बताने से ज्ञात होता है ?

मिट्टी अनंत जीवन का स्त्रोत है - पोषक तत्व प्रतिरोध क्षमता (न्यूट्रियेन्ट बफर पावर) का विज्ञान
१९८० के दशक में जब डाक्टर प्रभाकरण नायर हरित क्रांति की सफलता का मूल्यांकण कर रहे थे तो उन्होंने मिट्टी के स्वास्थय की परिभाषा ‘पोषक तत्व प्रतिरोध क्षमता’ की शुरुआत की । यह एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो मिट्टी के विज्ञान और पौधों के जीवन का संयोजन करता है । ज्यादातर वैज्ञानिकों के साथ यह समस्या थी कि उन्होंने या तो मिट्टी या पौधों के साथ काम किया था , दोनों के साथ नहीं । डाक्टर नायर ने दोनों का संयोजन कर एक परिवर्तनवादी सिद्धांत की शुरुआत की । उनका कहना है कि पौधे मिट्टी से पोषक तत्वों का चयन करते हैं । इसक मतलब है कि मिट्टी के पास -जो कि पौधे के जीवन का सहारा है – सभी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होना चाहिये । चूँकि पौधों द्वारा पोषक तत्वों को सोख लेने से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाएगी, किसानों का मुख्य काम यह है कि मिटी में पोषक तत्वों का सर्वोत्कृष्ट स्तर बनाये रखें । यही पोषक तत्व प्रतिरोध क्षमता का सार है और इसी कारण से उन्होंने कहा था कि `मिट्टी अनंत जीवन का स्त्रोत है’ । पाँच दशक पूर्व सर ऐल्बर्ट हावर्ड की तरह ही डाक्टर नायर द्वारा भारत के मौलिक कृषि प्रणाली की वैज्ञानिक व्याख्या सभी भारतवासियों के लिये पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन सुनिश्चित कर सकती थी मगर मिट्टी के स्वास्थय के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान को और मिट्टी के अनंत जीवन का स्त्रोत होने की बात पर ध्यान नहीं दिया गया और मंदबुद्धि वैज्ञानिक मिट्टी के स्वास्थ्य, जलीय जीवन, भूमिगत जलभृतों, इन्सानों का स्वास्थ्य और पृथ्वी के स्वास्थ्य को नष्ट करते रहे ।

उत्पादकता और क्षति के बीच विपरीत अनुपात का रिश्ता हैं
सिस्टम सिद्धांत में क्षति का एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसका मतलब है कि प्रणालीगत उत्पादकता में क्षति को सम्मिलित करना चाहिये जिसके बिना शुद्ध उत्पादकता जानना सम्भव नहीं है । अगर कोई किसान हर मौसम में ४००० किलो प्रति हेक्टेयर चावल उपजाता है तो उसकी उत्पादकता ४००० किलो प्रति हेक्टेयर दर्ज होती है । लेकिन अगर उपभोक्ता को मात्र २००० किलो उपलब्ध है तो शुद्ध प्रणालीगत उत्पादकता ५० प्रतिशत और क्षति ५० प्रतिशत हुई । क्षति फसल कटाई, ढुलाई, भंडारण, प्रक्रमण और वाल मार्ट जैसे बड़े खुदरे बाजार को सुपुर्दगी के दौरान हो सकती है । करीब १५ प्रतिशत उत्पादन घरों में बर्बाद होता है इस बात से कि बड़े सुपर स्टोर ग्राहकों को अपनी जरूरत से अधिक खरीदने के लिये कई प्रकार के प्रलोभन देते हैं । इसलिये किसान के अपनी उपज मार्केट में बेचने से लेकर उपभोक्ता तक पहुँचने तक हर कदम पर हो रहे क्षति का अनुमान होना चाहिये ताकि शुद्ध उत्पादकता का अनुमान लगाया जा सके ।

इन्हीं सब कारणों से प्रणालीगत उत्पादकता और क्षति के बीच विपरीत अनुपात का रिश्ता है । हर किसान कुछ अनाज अपने लिये रखता है और बाकी उपज स्थानीय बाजार में बेच देता है जिसके बाद उसकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है । उसने जितना हो सका उत्पादन किया, इसके बाद सार्वजनिक या निजी परिवहन, प्रबंधन और भंडारण व्यवस्था की जिम्मेदारी है । इस मामले में भारतीय सरकार १९४७ से लगातार विफल रही है इसके बावजूद कि १९४६ में प्रतिभाशाली भारतीय अर्थशास्त्रियों और सांख्यिकीविदों ने अनुसंधान आधारित सलाह दिया था कि भारतीय किसानों को वैज्ञानिक भंडारण और बाजार हेर-फेर से बचाव की जरूरत है ।

सरकार का अनुमान है कि भारत में उत्पादन के बाद २०% अनाज और ४०% बागीचों के उपज की बर्बादी होती है । खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एम-ओ-एफ-पी-आई) का अनुमान है कि करीब ५८० अरब (सौ करोड़) रुपये का अनाज उपज के बाद बर्बाद होता है लेकिन गलती से यह निष्कर्ष निकाला कि फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण) उद्योग इस बर्बादी को कम कर सकते हैं । अगर यह सही है तो अमेरिका और ब्रिटेन मानक स्थापित कर चुके होते !
ब्रिटेन के हाल ही के एक रिपोर्ट से यह मालूम होता है कि किसानों के खादान्न पैदा करने के बाद से लेकर सबसे उड़ाऊ उपभोक्ता के पेट तक पहुंचने तक ५०% बर्बाद हो जाते हैं और योरोप की हालत भी कुछ वैसी ही है । कुछ साल पहले एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने यह अनुमान लगाया था कि ब्रिटेन और अमेरिका कुल मिलाकर ५५०० अरब रुपये समतुल्य अन्न बर्बाद करते हैं । चीन में लगभग १७६ अरब रुपये का अनाज बर्बाद होता है और १२.८ करोड़ चीनी भूखे रहते हैं । वैश्विक बर्बादी का अनुमान नहीं है क्योंकि क्षति का कड़ाई से अनुमान कर लिपिबद्ध नहीं किया जाता है । विडंबना यह है कि अमीर पश्चिमी देशों मे अधिक बर्बादी होती है और जैसा कि कुछ विश्लेषकों का कहना है ` पश्चिमी देशों में अनाज के सम्मान की संस्कृति नहीं है’ और यही बात चीन और भारत के अमीरों के लिये भी सच है । जब सच्चाई यह है तो क्या हमें किसानों को पर्याप्त उत्पादन नहीं करने के लिये दोषी ठहराना चाहिये ?

कृषि जैव प्रौद्योगिकी उद्योग के झूठ
जैव प्रौद्योगिकी उद्योग वेबसाइट धोखे से यह दावा करती है कि `जैव प्रौद्योगिकी दुनिया को स्वस्थ बना सकता है, उस ईंधन दे सकता है, खाना खिला सकता है ।‘ बीस सालों के जबर्दस्त आवर्ती झूठ उस दिन अनावृत हो गये जिस दिन डाकटर डग गुरियन-शर्मन ने कहा कि `ट्रान्स्जेनिक शाक-सहिष्णु सोयाबीन और मक्का से पैदावार में बढ़ोतरी नहीं हुई है ।
पादप रोगवैज्ञानिक (प्लांट पथोलोजिस्ट) डाक्टर डौन हुबर ने चेतावनी दी थी कि ग्लाइफोसेट (जो कि एक खतरनाक कीटनाशक है मगर जी-एम पौधों के लिये आवश्यक है) के उपयोग से कई पादप रोग तीव्र हो जायेंगे,पौधों द्वारा रोगजनक और रोगों के प्रतिरोध को कमजोर या खत्म कर देंगे और मिट्टी और पादप पोषक तत्व स्थिर हो जायेंगे जिससे पौधे उनका उपयोग नहीं कर सकेंगे ।

एक इन्टरव्यू में डाक्टर हुबर ने आगे सविस्तार बताया कि “पोटैशियम, मैंगनीज, तांबा, आयरन, मैगनीशियम,कैल्शियम और ज़िंक मानव स्वास्थय के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं । ग्लाईफोसेट इन सभी की उपलब्धता कम कर देता है, जिन फसलों पर ग्लाईफोसेट का इस्तेमाल किया जाता है उनमें खनिज पोषक तत्वों की कमी हो जाती है । हम अपनी खाद्य फसलों में पोषक तत्वों की कमी देख रहे हैं ।”
वर्षों पहले डाक्टर नायर ने चेतावनी दी थी “ पादप कोशिका में एक अजनबी जीन उसकी जड़ों में विशिष्ट पोषकों के जमाव पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है और जड़ की सतह पर उस पोषक तत्व का औसत जमाव ही उसके अंतर्ग्रहण की प्रतिक्रिया को निश्चित करता है । ” मतलब यह है कि अजनबी जीन से पोषक तत्वों के अंतरग्रहण में बाधा आती है और चूँकि पौधों के जड़ और मृदा जीवाणुओं के बीच सहजीवी रिश्ता है, जी-एम फसल और ग्लाईफोसेट जीवित मिट्टी को नष्ट कर देते हैं । डाक्टर हुबर ने बताया कि जी-एम चारे पर पले पशुओं में बाँझपन और भ्रूण गर्भपात होता है ।

कृषि जैव प्रौद्योगिकी भूमंडलीकरण के वास्तुकारों, बहुराष्ट्रीय संस्थाओं और सुजनन वैज्ञानिकों (जातियों का खात्मा चाहने वाले) से प्रभावित है और मोंसान्टो और उसके साथी – अमरीकी सरकार, अमरीकी रक्षा विभाग, यू-एस-एड, बिल ऐन्ड मेलिन्डा गेट्स फाउन्डेशन (बी-एम-जी-एफ) और राकफेलर और फोर्ड फाउन्डेशन का हथियार है जिसके जरिये वह विश्व के खाद्य व्यवस्था पर पूरा अधिकार चाहते हैं । भारत में कम से कम ३ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और १४.८ लाख खेती करने वाले लोग उनकी नजर में हैं । पंजाब और हरियाणा जिन्हें ऊंची पैदावार के कारण ‘धान का कटोरा’ कहा जाता था अब प्राणहीन क्षेत्र हो चुके हैं जहाँ उपज मंद होती जा रही है , दाम बढ़ रहे हैं, प्राकृतिक साधन अत्यधिक दबाव से पीड़ित हैं, जमीन जहरीली है और किसान मर रहे हैं । किसानों के आत्महत्या की खबर भारत के सभी कोने से और विश्व के अन्य देशों से भी मिल रही है ।

विश्व को जहरीले कीटनाशक, विनाशकारी खाद और पेटेन्ट किये जी-ई (अनुवांशिक संशोधित) बीजों के `आधुनिक प्रौद्योगिकी’ की जरूरत नहीं है जो भारत में हुए १८९० ही नहीं बल्कि १७६० ईसवी की पैदावार का भी मुकाबला नहीं कर सकते हैं । आधुनिक प्रौद्योगिकी वास्तव में खाद्य पदार्थों में पोषण की कमी पैदा कर रहे हैं । खाद्य फसलों पर कोई उपज या पोषण का मानक निर्धारित करने की बजाय इस विक्षिप्त जैव प्रौद्योगिकी उद्योग ने खेती को नष्ट ही किया है ।
ऐतिहासिक तौर पर भारत के किसानों ने दुनिया को यह साबित कर दिखाया था कि चाहे अनाज की जरूरत जितनी भी हो, सब कुछ जैविक और टिकाऊ खेती द्वारा उपजाया जा सकता है । साथ ही नेक और बुद्धिमान वैज्ञानिकों ने यह भी समझाया था कि यह काम अनंत काल तक किया जा सकता है । भूमि जीवन प्रदान करती है और हर जीव को सहारा भी देती है, पेड़ पौधे और फसल पोषक तत्वों को अन्य जीवों तक पहुंचाते हैं । किसान हमें जिन्दा रखते हैं , सारे विश्व के अन्नदाता हैं, दुनिया की भूख और भुखमरी का हल उन्हीं के हाथों में है ।
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इस ब्लॉग में छपे लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए स्वास्थ्य, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरण और राजनीतिक मुद्दों की समझ उन्नत करने के लिए उपलब्ध कराए गए हैं |

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