Monday, 4 January 2016

फ्री बेसिक्स सिर्फ इन्टरनेट नहीं कई और अधिकार भी छीन लेगा हमसे


फ्री बेसिक्स - निगमों द्वारा भारत की बुनियादी अर्थव्यवस्था को अपने हाथों में करने की कोशिश

(डॉ वन्दना शिवा के लेख http://vandanashiva.com/?p=369https://medium.com/@drvandanashiva/free-basics-will-take-away-more-than-our-right-to-the-internet-4d39422fe122#.y1zrm8q26 का हिन्दी अनुवाद )      

इधर टीआरएआई (TRAI)`फ्री बेसिक्स' के भाग्य का फैसला कर रहा है और उधर मार्क जकरबर्ग उसके विज्ञापन के लिये सौ करोड़ रुपये लेकर भारत आ चुके हैं । फेसबुक का `फ्री बेसिक्स' इन्टरनेट डॉट ओआरजी का नया रूप है जिसमें फेसबुक यह निश्चित करेगा कि इन्टरनेट में कौन सी सूचना उपयोगकर्ताओं के लिये महत्वपूर्ण हैं ।


रिलायंस जो कि फेसबुक के `फ्री बेसिक्स' उद्यम में भागीदार है, भारत की उन बड़ी कंपनियों मे से है जिसे दूरसंचार, उर्जा,खाद्य सामग्री, फुटकर बिक्री , अवसंरचना और हाँ, जमीन में भी दिल्चस्पी है । रिलायंस ने अपने ग्रामीण सेल फोन टावरों के लिये भारत सरकार से जमीन ली, साथ ही धोखाधड़ी और हिंसा  के जरिये किसानों से जमीन छीनी जिसके कारण बिना कोई कीमत दिये एक ऐसा बड़ा इलाका उनके हाथ आ गया है जो ग्रामीण और उपनगरीय उपयोगकर्ता का आधार है खासकर किसानों का । हालाँकि `फ्री  बेसिक्स ' पर फिलहाल रोक लगा दिया गया है, रिलायंस ने अपने नेटवर्क में इस सेवा को जारी रखा है ।

विश्व स्तर पर एक सामुहिक कॉर्पोरेट हमला चल रहा है । अपने सभी लक्ष्यों को निशाने में रखकर बिल गेट्स जैसे कॉर्पोरेट अमेरिका के अनुभवी अब अगली पीढ़ी के मार्क जकरबर्ग जैसे कॉर्पोरेट- समाजसेवी -साम्राज्यवादियों से जुड़ रहे हैं । गेट्स और जकरबर्ग - दोनों की प्रचार कहानी एक ही है- कि दोनों ने अपनी संपत्ति दान दे दी है । जकरबर्ग और उसका परिवार अपनी निवेश पूँजी ४५ अरब अमरीकी डॉलर के लिये जो भी अस्तित्व बनाये, वह आखिर में बिल और मेलिन्डा गेट्स की संस्था जैसा ही होगा जो जलवायु वार्तालाप पर अपना बोलबाला जमाये रखेगा और किसी भी गलती के लिये खुद को जिम्मेदार नहीं मानेगा ।

गेट्स और जकरबर्ग को जलवायु शिखर सम्मेलन के दौरान सरकारों पर अपना हुक्म चलाने से क्या मिलेगा ? " उर्जा गठबंधन ऐसे विचारों में निवेश करेगा जिसमें हमारे उर्जा उत्पादन और उपभोग के तरीके को बदलने की क्षमता होगी " ऐसा जकरबर्ग ने अपने फेसबुक पन्ने पर लिखा । और यह बिल गेट्स की उर्जा गठबंधन की घोषणा थी कि करोड़ों की संयुक्त सम्पत्ति वाले २८ निजी निवेशकों का धन यह निर्णय करेगा कि उर्जा का उत्पादन और उपभोग कैसे होगा ।


साथ ही गेट्स आजकल अफ्रीका में एजीआरए (अलायंस फॉर ग्रीन रेवोल्युशन इन अफ्रीका) के जरिये रसायनिक और जीवाश्म ईंधन पर निर्भर कृषि और पेटेन्ट जीएम (# फॉसिल एजी) जबरदस्ती लाना चाह रहे हैं । यह अफ्रीकी किसानों की अजादी खत्म कर उन्हें जीवाश्म ईंधन साथ ही मोन्सान्टो के पेटेन्ट बीज और पेट्रोरसायन पर निर्भर बना देने का भरसक प्रयत्न है ।

भारत का ९५ प्रतिशत कपास मोन्सान्टो का बीटी कपास है । इस वर्ष पंजाब से कर्नाटक तक के इलाकों में  ८० प्रतिशत बीटी फसल बर्बाद हुई - जिसका मतलब है ७६ प्रतिशत बीटी कपास वाले किसानों के पास फसल कटाई के वक्त कोई फसल नहीं थी । अगर उनके पास कोई और तरीका होता तो वह उसे अपनाते । लेकिन बीज तो बदले ही नहीं जा सकते हैं क्योंकि बीटी कपास के बीज तो सभी एक ही हैं बस कंपनियाँ उन्हें अलग अलग नामों से बेचती हैं और बेचारे किसान उन्हें भिन्न समझकर बार बार खरीदते हैं और विभिन्न रसायनों और कीटनाशकों के साथ उगाने की कोशिश करते हैं । सभी कीटनाशकों, शाकनाशी आदि के अलग अलग मुश्किल रसायनिक नाम होते हैं ताकि किसान ज्यादा से ज्यादा परेशान और असहाय महसूस करते रहें जबतक कि वह अपनी जान नहीं ले लेते।

मोन्सन्टो ने बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) कानून और पेटेन्ट बीज द्वारा बाजार जबरदस्ती कब्जा करके जो किया है वही जकरबर्ग अब इन्टरनेट की आजादी के साथ करना चाह रहा है और बिल्कुल मोन्सन्टो की तरह वह सबसे अधिकारहीन भारतीयों को इसका निशाना बना रहा है ।

फ्री बेसिक्स भारतीयों के लिये इन्टरनेट को सीमित कर देगा । शुरू में ही फ्री बेसिक्स ने यह कह दिया है कि वीडियो सामग्री की अनुमति नहीं दी जायेगी क्योंकि वह टेलीकॉम कंपनियों की सेवाओं के साथ हस्तक्षेप करेगा (यानि मुनाफे के साथ), और यह टीआरएआई  की अपनी सिफारिश के बावजूद कि वीडियो सामग्री जनसंख्या के विभिन्न भागों को उपलब्ध हो ।

एक बार इसे निःशुल्क सेवा के रूप में स्वीकृति मिल जाए उसके बाद क्या अगर दूरसंचार कंपनियाँ अपने और अपने भगीदारों के फायदे के लिये फिर से इन्टरनेट को परिभाषित करना चाहे तो उन्हें कौन रोक सकता है? रिलायंस को ही देखिये, फ्री बेसिक्स पर रोक लगाये जाने के बाद भी वह इस सेवा को अपने उपयोगकरर्ताओं को उपलब्ध कराता है जिसका एक बड़ा हिस्सा किसान हैं ।
मार्क जकरबर्ग यह क्यों फैसला करे कि पंजाब के एक किसान के लिये , जिसके कपास की ८० प्रतिशत फसल मोन्सान्टो के बीटी कपास के बीज और रसायनो के कारण बर्बाद हो गयी है, इन्टरनेट कितना जरूरी है? क्या इन्टरनेट उसे यह देखने दे कि किस तरह जीएम प्रौद्योगिकी दुनिया के हर कोने में नाकाम हो रही है और सिर्फ अनुचित बाजार और व्यापार नीतियों की वजह से बची हुआ है, या क्या इन्टरनेट यह सुझाव दे कि अगला नया पेटेंट अणु कौन सा है जिसका वह अपने फसलों पर छिड़काव करे ?

मोन्सान्टो और फेसबुक का रिश्ता बहुत ही गहरा है । मोन्सान्टो और फेसबुक के १२ सर्वोच्च निवेशक लगभग एक ही हैं जिसमे वैनगार्ड ग्रुप भी है। यही वैनगार्ड ग्रुप जॉन डीयर में भी एक ऊँचे दर्जे का निवेशक है और `स्मार्ट ट्रैक्टरों' के लिये मोन्सान्टो का नया साथी है जिससे सभी खाद्य उत्पादन और खपत बीज से लेकर आँकड़ों तक मुट्ठी भर निवेशकों के हाथ में होगी । इसलिये यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि `मार्च अगैन्स्ट मोन्सान्टो' का फेसबुक पन्ना जो कि एक बड़ी अमेरिकी आन्दोलन है जो जीएम का विनियमन और सूचक पत्र चाहती है, उसे नष्ट कर दिया गया

हाल में भारत में ई-रिटेलिंग में जोरों की बढ़ोतरी हुई है । बड़े व्यापारसंघों से लेकर उद्यमियों तक सभी बिकाऊ चीजों को बेच सकते हैं, वह बाजार जो उन्हें उपलब्ध नहीं था अब उनकी पहुँच में है । शिल्पकार अपने व्यापार को बढ़ाने में सक्षम हुए हैं और खेतों को आस पास उपभोक्ता मिल गये है । 

ठीक मोन्सान्टो और उसके पेटेन्ट बीजों की तरह जकरबर्ग केक का सिर्फ एक हिस्सा नहीं बल्कि भारतीय जनता की बुनियादी अर्थव्यवस्था का पूरा केक ही चाहते हैं खासकर गरीब किसानों का । मोन्सान्टॉ का फेसबुक द्वारा नियन्त्रित जलवायु डेटा उन गरीब किसानों के लिये क्या मायने रखेगा जो फेसबुक के माध्यम से गुलाम बन गये हैं ? ईसका इन्टरनेट और खाद्य लोकतन्त्रता के लिये क्या मायने होगा ?

अपने भोजन पर अधिकार अपना भोजन चुनने का अधिकार है, यह जानने का अधिकार कि हमारे खाने में क्या है ((#LabelGMOsNow) और पोषक, स्वादिष्ट भोजन चुनने का अधिकार न कि व्यापारसंघों द्वारा पैकेटों में भरे चन्द खाद्य वस्तुओं पर निर्वाह करना ।
ठीक उसी तरह इन्टरनेट पर अधिकार यह अधिकार है कि नेट पर कौन सी जगह हम जायें, जो हमें लगे कि खुद के लिये सही है, न कि जो कंपनियाँ सोंचे हमारे लिये सही है ।

हमारा यह जानने का अधिकार कि हम क्या खा रहे हैं उतना ही जरूरी है जितना समाचार और हर प्रकार की सूचना मिलने का अधिकार । इन्टरनेट की स्वतंत्रता का अधिकार हमारे लोकतन्त्र के लिये उतना ही जरूरी है जितना बीज बचाने, प्रतिदान और किसानों के प्राकृतिक परागण बीजों को बेचने का अधिकार ।

जकरबर्ग की द्विअर्थी भाषा में (जिसे अंग्रेजी में `ऑर्वेलियन डबलस्पीक' कहते हैं ) फ्री का अर्थ `निजीकरण' होता है जिसका व्यक्तिगतता से कोई संबंध नहीं है । निगमों द्वारा लिखित `मुक्त व्यापार समझौते' की तरह `फ्री बेसिक्स' में कुछ भी फ्री नहीं है । यह आम चीजों का घेराव है , उन चीजों का घेराव जो उनके साधारण नागरिक तक पहुँचने का मार्ग खोलता है चाहे वह बीज हो या पानी या समाचार या इन्टरनेट । मोन्सान्टो के आईपीआर से बीजों का जो संबंध है वही संबंध फ्री बेसिक्स और समाचार के बीच है। 

जॉन डीयर से स्मार्ट ट्रैक्टर लेकर उन खेतों में इस्तेमाल होगा जिनमें मोन्सान्टो के पेटेन्ट बीज उगाए जा रहे हों, जिनपर बेयर केमिकल के कीटनाशक डालकर उन्हें बर्बाद कर दिया जायेगा, जिसकी मिट्टी और आबोहवा के डेटा का मालिक और बेचने वाला मोन्सान्टो होगा, जो आपके फेसबुक प्रोफाइल के रुप में लॉग-इन करके रिलायंस द्वारा किसानों के फोने को भेजा जायेगा उस जमीन पर जो वैनगार्ड ग्रुप की है।
इस प्रक्रिया का हर कदम उस स्थान तक जहाँ आप किसी सुपर मार्केट से कोई सामान खरीद रहे हों, चन्द बड़े शेयरधारियों के हित में उनकी मर्जी से निर्धारित होगा ।

ऐसा होगा हमारा चुनने का अधिकार ।
                                            
कृपया यहाँ जाकर टीआरएआई को बताएँ कि हमें नेट निष्पक्षता चाहिये   http://www.savetheinternet.in

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