Tuesday, 8 December 2015

मोन्सान्टो की भयावह योजना - भारतीय किसानों का नियोजित खात्मा

कॉलिन टॉडहन्टर के लेख http://www.colintodhunter.com/2015/09/global-research-counterpunch.html  का हिन्दी अनुवाद 

वैश्विक कृषि व्यवसाय वाले हमेशा यही कहते हैं कि उन्हें विश्व भर के किसान और मानवजाति की चिन्ता है इसलिये जीएम खाद्य फसलों की खेती से वह बढ़ती अबादी की भूख और किसानों को पर्याप्त आमदनी दिलाने की समस्याओं का हल करना चाहते हैं । मगर क्या यह सच है ? आइये देखते हैं ।

अपनी कंपनी और उत्पाद को बढ़ावा देने के लिये अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड ने १९५० और १९६० के दशक में विज्ञापनों की शृंखला बनाई थी । उनमें से एक था जिसमें एक विशाल हाथ एक प्रयोगशाला कुप्पी से भारतीय मिट्टी पर रसायन डालता नजर आता है  मानो भगवान के हाथ के रूप में यूनियन कार्बाइड  पिछड़े और गरीब भारतीय किसानों की मदद कर रहा हो ।  

लेकिन भोपाल की भयानक दुर्घटना, अनगिनत लोगों की मौत , उस कंपनी द्वारा न्याय को चकमा देना और भोपाल पीड़ितों के लिये कुछ भी नहीं करने से साफ जाहिर है कि उन्हें इन्सानों की बिल्कुल परवाह नहीं बस मुनाफे की चिन्ता है । अगर उन्हें चिन्ता होती तो उन आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को सुधारने की कोशिश करते जिससे गरीबी और भुखमरी बढ़ती है। उसमें उनकी अपनी भूमिका भी शामिल है जैसे कि `कृषि पर ज्ञान पहल' और ट्रान्सऐटलांटिक ट्रेड ऐंड इन्वेस्टमेंट पार्ट्नर्शिप (टीटीआईपी) जो उन्हें विश्व भर की खेती का अपनी इच्छा स्वरूप पुनर्निर्माण करने की इजाजत देता है।

सच तो यह है कि अमेरिकी वैश्विक शक्ति का विकास अमेरिकी कृषि व्यवसाय द्वारा दुनिया के खाद्य समृद्ध देशों को मुहताज देशों में बदल देने से हुआ है | खेती में सुधार लाने का बहाना उनके लिये द्वार खोलता है, वह अन्दर आते हैं, अपनी जहरीली रसायनिक खेती से फसलों, खेतों और किसानों को बर्बाद करते हैं और फिर इस बर्बादी को सुधारने के बहाने खेती पर अधिकार जमा लेते हैं ।  याद रखें देश का खाद्य भंडार जिसके हाथ में होता है देश की जनता उसपर आश्रित होती है । इनके कपटी तरीके बेचारे किसान समझ नहीं पाते हैं । मोन्सान्टो ने पिछले दस वर्षों में गरीब भारतीय किसानों से करीब ९०० मिलियन अमेरिकन डालर ( ९० करोड़ रुपये) गैरकानूनी ढंग से कमाया है ।

हाल में भारत के  स्टेट्स्मैन समाचार पत्र में भरत डोगरा ने एक गरीब किसान के बारे में लिखा जिसे मोन्सान्टो ने झाँसा देकर मुनाफा कमाया । बाबू लाल और उनकी पत्नी मिर्दी बाई राजस्थान में जैविक खेती करके अपने दस सदस्यों के परिवार और मवेशी की जिन्दगी चलाते थे। एक अज्ञात कंपनी के एजेन्ट ने ( ध्यान रखें कि भारत में जीएम कपास की खेती मोन्सान्टो और उसकी सहायक कंपनियों के अधीन है ) उन्हें बीटी कपास की खेती के लिये बड़ी रकम देने का वादा किया । बाबू लाल ने कीटनाशक भी खरीद लिये ताकि पैदावार से कुछ पैसे कमा सकें, मगर वह रकम उन्हें नहीं मिली क्योंकि कंपनी ने पैदा होने वाले बीज को परीक्षण में असफल घोषित किया ।  अन्न और चारा के अभाव में बाबूलाल को ऊँची ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ा । वह बर्बाद हो गए । ऐसी हालत में भी कंपनी के एजेन्ट अपने दिये रसायन और कीटनाशक के १०, ००० रुपये पाने के लिये बाबूलाल को परेशान करते रहे । उस इलाके के कई और किसानों के साथ यही हुआ ।

बड़ी नकद का वादा गरीब किसान मना नहीं कर पाते और बड़ी कंपनियों के चंगुल में फँस जाते हैं । परीक्षण को सफल तब माना जाता है जब कंपनियों को मुनाफा होता है, चाहे बीज, रसायनों और कीटनाशकों की खरीदारी से किसानों का मुनाफा खत्म क्यों न हो जाए जो कि आम है। और जब परीक्षण असफल होता है तो किसान बर्बाद होते ही हैं। बीटी कपास क्षेत्र में १९९७ से हुई लगभग ३ लाख किसानों की आत्महत्या का यही कारण है । बीटी कपास की खेती ने खाद्य सुरक्षा खत्म कर दी है और जहरीले कीटनाशकों और रसायनों से स्वास्थ्य और वातावरण को हानि पहुँची है ।

यह कहानी विश्व के लाखों किसानों के साथ हो रही है। हर जगह एक ही बात दिखती है - कंपनियों के मुनाफे के लिये जबरन एकल फसल की खेती , उनके हानिकारक रसायन और बीज का प्रयोग, फसलों का नष्ट होना, कई बार बाजार में सही दाम न मिलना क्योंकि अमेरिकी माल के पक्ष में धांधली चलती है,ऋण का असहनीय बोझ और फिर देश की खाद्य सुरक्षा का खात्मा और आयात पर निर्भरता की शुरुआत ।

सोंचिये कि भारत के ग्रामीण इलाकों में ६७ करोड़ लोग ३३ रुपयों से कम की रोजी पर रहते हैं । ३.२ करोड़ लोग २००७ से २००१२ के बीच खेती छोड़ चुके । वह कहाँ गये ? नौकरी की खोज में शहर गये लेकिन वहाँ नौकरी तो है ही नहीं !

२००५ से २०१५ के बीच राष्ट्रीय स्तर पर मात्र १.५ करोड़ नौकरियाँ बनीं जबकि श्रमिकों की बढ़ती संख्या को नौकरी देने के लिये प्रति वर्ष १.२ करोड़ नौकरियों की जरूरत है । इसलिये अगर हम बाबू लाल जैसे लाखों किसानों को कृषिजन्य व्यापार के हाथ या पश्चिमी देशों के इशारे पर चलने वाले बाजार के हवाले कर देंगे तो वह सभी खत्म हो जाएंगे । भारत सरकार उन्हें अकेले जूझने को छोड़कर यही तो कर रही हैं । यह वही कंपनियाँ हैं जिनके नौकर विश्व व्यापार संगठन में यह माँग कर रहे हैं कि भारत आयात प्रतिबंधों को कम कर दे ।

पश्चिम देश पूरी कोशिश में लगे हैं कि भारतीय कृषि की सब्सिडी में कटौती हो, मूल्य समर्थन तंत्र और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जिनके सही ढंग से चलने से किसानों को उचित और टिकाऊ आय मिलती है, वह नष्ट हो जाय इसलिये भारतीय किसान बड़ी संख्या में खेती छोड़कर जा रहे हैं। उन्हें खेती से निकालने का यह योजनाबद्ध कार्यक्रम है ताकि खेती विदेशी कंपनियों के हाथों में चली जाय ।

ऐसा पहले भी हुआ था जब ईस्ट इन्डिया कंपनी ने भारत में कदम रखा था । धीरे धीरे उनकी पकड़ मजबूत होती चली गई और भारत गुलाम हो गया था । उस गुलामी से निकलने में भारत को कई सौ साल लगे ।

संरचनात्मक हिंसा को बंदूक या चाकू की जरूरत नहीं होती, राजनीतिक विकल्प और आर्थिक नीतियाँ ही काफी होती हैं। इस तरह की हिंसा ने स्वदेशी खेती को जड़ से उखाड़ डाला है (जैसा कि यहाँ आप पढ़ सकते हैं) और उसकी जगह पश्चिम देशों के जहरीली खेती की शुरुआत की जो कि १९६० के दशक में `हरित क्रांति' से हुई और आज जीएम कपास और जीएम खाद्य फसलों के खुले क्षेत्र परीक्षण के साथ यह तेजी से आगे बढ़ रही है (जीएम धोखधड़ी है इसका पर्दाफाश यहाँ किया गया है)

अब सवाल यह है कि क्या हम हजारों वर्षों की परंपरागत कौशल और कृषि ज्ञान को ऐसी आधुनिक खेती के लिये बलिदान कर दें जो विदेशी कंपनियों की जेबें भरती है और देश के किसानो और हमारी खाद्य सुरक्षा का खात्मा कर देती है ?

बिजनेस स्टैन्डर्ड (बीएस) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में बीटी कपास की पैदावार पाँच सालों मे सबसे अधिक गिरी है। कुछ सालों तक जो पैदावार बढ़ी थी वह बीटी कपास के कारण नहीं हुई जैसा कि इस लेख में बताया गया है  और फिर लगातार कम होती गई । कारण ? बीटी कपास के बौल वर्म कीड़ों में प्रतिरोध क्षमता पैदा हो गई । मोंसांटो के प्रवक्ता ने कहा कि ऐसी क्षमता होती है । लेकिन शुरू में उन्होंने किसानों को बताया था कि उन्हें कीटनाशकों की जरूरत नहीं होगी बस बीज बोना और नियमित रूप से सिंचाई करनी होगी । अब वह कहते हैं कि किसान खुद जिम्मेवार हैं क्योंकि यह गलत तरीके और गलत बायोटेक बीज के इस्तेमाल से हुआ है। अपने बचाव में उनका कहना हैं कि पैदावार गिरने से रोकने के लिये वह लगातार शोध एवं विकास में लगे हैं ।  

संपत्तिवाद का मूल ध्येय - एक तरफ नियोजित रूप से अपने उत्पादों का खात्मा ताकि नया सामान लगातार बनता रहे, उनकी जेबें भरती रहे और दूसरी तरफ गरीब भारतीय किसानों का खात्मा ताकि खेती कंपनियों के हाथ आ जाए । और सबसे बड़ा धोखा यह है कि अपनी सभी विफलताओं को वह बड़ी धूमधाम से सफलता बताकर पेश करतीं हैं।

परंपरागत खेती का विनाश पंजाब और हरयाणा के कपास क्षेत्र में हाल में हुई बीटी कपास के फसल की बर्बादी से मालूम होता है। कीटनाशकों का सफेद मक्खियों पर कोई असर नहीं हुआ और कंपनियों ने किसानों को दोषी ठहराया । वही बौल वर्म वाली कहानी ।

खाद्य और व्यापार नीति विश्लेषक श्री देविन्दर शर्मा अपने ब्लाग में लिखते हैं कि सिर्फ उस बार सफेद मक्खी ने कपास की फसल को बर्बाद नहीं किया जिस बार उनपर कीटनाशकों के बदले किसानों ने प्राकृतिक `कीट संतुलन' तरीकों का इस्तेमाल किया जिसमें उन कीड़ों का इस्तेमाल किया गया जो कीटों को अपना आहार बनाते हैं। श्री शर्मा कहते हैं कि वह ऐसी महिलाओं को जानते हैं जो ११० मांसाहारी और ६० से अधिक शाकाहारी कीड़ों की जाति पहचानती हैं। कुछ साल पहले उन्होंने यह भी बताया था कि इस तरीके को `मीली बग' पर काबू के लिये बखूबी इस्तेमाल किया गया था ।

उस यूनियन कार्बाइड के पोस्टर को पचास साल हो गये हैं, वयवसायिक खेती वाले अब और चालाकी से काम करते हैं मगर उनकी सोंच आज भी उतनी ही घटिया है । वह खुद को गरीब किसानो का भगवान और ज्ञान में कहीं बेहतर समझते हैं मगर उनके जहरीली खेती के तरीके अपनाने से जो बर्बादी होती है उसे वह नकार जाते हैं ।

सदियों की प्रयत्न-त्रुटि विधि से मिला प्राकृतिक खेती का ज्ञान व्यवसायिक खेती को अपनाने से खत्म हुआ जा रहा है। इससे पहले कि वह हमेशा के लिये खत्म हो जाए और देश का भविष्य अंधकारमय हो जाए उसे पुनर्जीवित करना जरूरी है। और यह तभी होगा जब सरकार और देशवासी बड़ी विदेशी कंपनियों को नहीं बल्कि अपने छोटे किसानों को सहयोग देंगे ।

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