Tuesday, 24 November 2015

जब भारतीय कृषि होगी मोन्सान्टो के अधीन तब भारत पर होगा अमेरिका का राज




http://www.colintodhunter.com/2014/11/the-subjugation-of-india-by-us-rests-on.html का हिन्दी अनुवाद

चार साल से अधिक समय तक जीएम खाद्य फसलों का अध्ययन करने के बाद भारत की कृषि संबन्धी बहुदलीय संसदीय स्थाई समिति ने यह कहते हुए उनपर प्रतिबंध लगाने की सलाह दी कि छोटे किसानों के देश में इनकी कोई भूमिका नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने टेकनिकल एक्सपर्ट कमिटी (टीईसी) को नियुक्त किया जिसने यह सुझाव दिया कि जीएम फसलों पर तबतक रोक लगाना चाहिये जबतक सरकार उचित नियामक और सुरक्षा तंत्र तैयार नही कर लेती है। अभी तक ऐसी कोई भी सुरक्षा तंत्र तैयार नहीं की गई है मगर धान, मक्का, चना,गन्ना और बैगन जैसी कई जीएम फसलों को खुले खेतों में आजमाने की इजाजत दी जा रही है।

इस वक्त भारत में व्यवसायिक रूप से उगायी जाने वाली जीएम फसल एक ही है - बीटी कपास, जिसने कोई खास सफलता हासिल नहीं की है जिसका जीएम समर्थन लाबी हमे विश्वास दिलाना चाहती है।
हैददराबाद  सेल्युलर और आणविक जीवविज्ञान केन्द्र के संस्थापक निदेशक पुष्प एम भार्गव ने हिन्दुस्तान टाइम्स में यह लिखा है कि
·      बीटी कपास भारत में शायद ही सफल हुआ है चूंकि यह कपास सिर्फ सिंचित क्षेत्रों में सफल हुआ, वर्षा-पोषित क्षेत्रों में नहीं जो कि कपास की खेतों का कुल दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं।
·      कुल २७०,००० किसानों की जो मौत हुई है, उसमें बीटी कपास की खेती करने वाले किसानों की संख्या काफी है।
·      आंध्र प्रदेश में बीटी कपास के पौधों के अवशेष पर चरने वाले मवेशी हजारों की संख्या में मारे गए हैं।
·      पिछले कुछ वर्षों से बीटी कपास के कीड़ों में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गई है और मीली बग जैसे अतिरिक्त कीटों की संख्या में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हुई है।
·      जिन खेतों मे लम्बे समय तक बीटी कपास की खेती की गई है वहाँ की मिट्टी अन्य खाद्य फसलों का पोषण नहीं कर पाती है यानि कि वह खेत बर्बाद हो गए हैं।
·      संयुक्त राष्ट्र के ९० प्रतिशत सदस्य देशों ने जिसमें योरप के लगभग सभी देश शामिल हैं- जीएम खाद्य फसल या बिना लेबल के जीएम खाद्य पदार्थों को स्वीकृति नहीं दी है।
·      जीएम खाद्य फसलों का मानव, पशु, और पौधों के स्वास्थ्य साथ ही पर्यावरण और जैव विविधता पर हानिकारक प्रभावों को सिद्ध करने के लिये अत्यधिक विश्वसनीय वैज्ञानिकों द्वारा ५०० से अधिक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए हैं।
·      दूसरी ओर जीएम फसलों का समर्थन करने वाले सभी वैज्ञानिक ऐसे हैं जिनकी विश्वसनीयता शंकास्पद है।
·      भारत की बढ़्ती आबादी को भुखमरी से बचाने के लिये जीएम खाद्य फसलों की अत्यंत जरूरत है - यह तर्क बिल्कुल झूठा है। आज भी जब उपज चरम सीम पर नहीं है, भारत में जनता के लिये पर्याप्त अन्न है।
·      गैर जीएम प्रौद्योगिकियों द्वारा (जैसे कि आणविक प्रजनन) खाद्य उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है ताकि जीव जंतुओं और पर्यावरण को कोई हानि न हो।
·      जीएम फसलों की विषाक्तता पर शायद ही कोई परीक्षण हुआ है और जहाँ हुआ है वहाँ पाया गया है कि जीएम फसल कैंसर पैदा करते हैं।

२००३ में जीएम खाद्य फसलों के सभी पहलुओं की जाँच करने के बाद कई देशों के स्वतंत्र वैज्ञानिकों के संगठन से बने स्वतंत्र विज्ञान पैनेल ने यह निष्कर्ष निकाला -
" जीएम फसल से जो लाभ पाने की बात कही गई थी वह देने में वह असफल रहे हैं साथ ही खती में नई समस्याएं खड़ी कर रहे हैं। यह अब अच्छी तरह मालूम हो चुका है कि ट्रान्स्जेनिक प्रदूषण होना ही है इसलिये जीएम और गैर जीएम खेती साथ साथ नहीं हो सकती है। और सबसे जरूरी बात यह है कि जीएम फसलों को सुरक्षित साबित नहीं किया गया है। बल्कि बहुतेरे सबूत यह साबित करते हैं कि अगर गम्भीर सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज किया गया तो स्वास्थ्य और पर्यावरण को अपरिवर्तनीय हानि हो सकती है। इसलिये इन्हें अस्वीकार करना चाहिये।"

भरत डोगरा `द स्टेट्स्मैन' में प्रोफेसर सूसन बार्डोज का उद्धरण करते हुए कहते हैं -
"जीएम मानव इतिहास में प्रथम अपरिवर्तनीय प्रौद्योगिकी है। एक बार जीएम जीव हमारे नियंत्रण से निकल जाये तो हुम उसे वापस नहीं बुला सकते । "

डोगरा यह भी बताते हैं कि योरप, कैनडा और न्यूजीलैंड के सत्रह वैज्ञानिको ने भारत के प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह को जीएम फसलों के खतरों, खाद्य सुरक्षा, खेती और जैव सुरक्षा पर होने वाले अपरिवर्तनीय जोखिमों के बारे चेतावनी देते हुए पत्र लिखा। यह पत्र कहता हैः

"जीएम परिवर्तन की प्रक्रिया मेजबान जीव में ऐसी गड़बड़ी पैद करती है जो उसकी अनुवांशिक संरचना और क्रियाओं को बदल डालता है साथ ही जीव के रसायन में बदलाव पैदा करता है। इससे नये विष और एलर्जी पैदा करने वाले तत्व बन सकते हैं और साथ ही पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।"
                                                                                                     
`द हिंदू' में अरुणा राड्रिग्ज कहती हैं कि भारत के विभिन्न सरकारी रिपोर्टों में जीएम के बुरे प्रभावों पर उल्लेखनीय सहमति है।

इसके बावजूद भी भारत जीएम कार्यसूची को आगे बढ़ा रहा है। फिर इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि भार्गव इस निष्कर्ष पर आते हैं कि भारत के केंद्रीय सरकार के विभाग जीएम प्रौद्योगिकी के विक्रेता की भूमिका निभाते हैं और शायद जीएम बीज का व्यापार करने वाले बहुराष्ट्रीय निगमों से भी संबन्ध रखते हैं।
इसमे शक नहीं कि यह मिलीभगत जीएमओ के ऊपर भी जाती है।

बड़े कृषि प्रौद्योगिकी के पक्ष में विश्व बैंक/ अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) /विश्व व्यापर संगठन (डबल्यूटीओ) के लक्ष्य और भारत के द्वार इस लक्ष्य के लिये खोलने की बात अच्छी तरह प्रलेखित है। आज्ञाकारी राजनेताओं की सहायता से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारतीय किसानों की जमीन और भारतीय बाजार में निर्बाध प्रवेश चाहती हैं। इस प्रकार मुक्त व्यापार के झूठे नाम पर भारतीय समाज का पुनः निर्माण किया जाएगा जो लाखों लोगों की आजीविका का विनाश कर देगा (इसकी शुरुआत हो चुकी)।
जिस बैठक में अमेरिका के साथ कृषि पर ज्ञान पहल का समझौता किया गया था उसमें मोन्सान्टो, वाल्मार्ट और अन्य बड़े अमेरिकी  व्यापारसंघ सबसे ऊंचे स्थान पर विराजमान थे । साथ ही भारत के कपास उद्योग पर मोन्सांटो का नियंत्रण है और वक्त के साथ ज्यादा से ज्यादा पब्लिक विश्वविद्यालयों और संस्थाओं में कृषि अनुसंधान, नीति और ज्ञान को मनचाहा आकार देकर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है| अतः इसे "समकालीन ईस्ट इन्डिया कंपनी" कहा जा सकता है।

कौन कार्यसूची बना रहा है इसके और सबूत मिलते हैं वन्दना शिवा से जिन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला है कि जीएम खाद्य फसलों के क्षेत्र परीक्षण की स्वीकृति पाने के लिये जोर जबरदस्ती से कई राजनेताओं को रास्ते से हटाया गया ।

वन्दना शिवा और अरुणा राड्रिग्स जैसे लोग जो वैध रूप से विरोध करते हैं या रचनात्मक पक्षान्तर प्रस्तुत करते हैं उन्हें खूफिया रिपोर्ट के द्वारा नीचा दिखाया जाता है । रिपोर्ट के लेखक उन्ही बहुराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा प्रायोजित किये जाते हैं जो भारत को अपने अधीन करना चाहते हैं । इसका मतलब है खेती पर जिसका नियंत्रण होगा वह भारत पर राज करेगा ।

भार्गव कहते हैं कि भारत में ६४ प्रतिशत लोग अपनी जीविका के लिये खेती पर निर्भर करते हैं। इसलिये भारतीय कृषि जिसके भी अधीन होगा, भारत उसके नियंत्रण में होगा। और मूल बात यहाँ सामने आती है। भारतीय कृषि देश की नींव है और उसे नियंत्रण में लाने के लिये बस बीज और कृषि रसायनों को अपने कब्जे में लेने की जरूरत है। मोन्सांटो और अमेरिकन राज्य विभाग में उसके समर्थक यह अच्छी तरह समझते हैं।

अमेरिका की विदेश नीति ज्यादातर कृषि पर अपना अधिकार जमाने पर आश्रित है।
"अमेरिका की विदेश नीति का आधार खाद्य पदार्थों का निर्यात रहा है, औद्योगिक निर्यात नहीं जैसा कि कई लोग सोंचते हैं। कृषि और खाद्य पदार्थों को अपने कब्जे में लेकर अमेरिकी राजनीति ने लगभग सभी पिछड़े राष्ट्रों को अपने अधीन बना लिया है। देशों को खाद्य समृद्ध बनाने की बजाय विश्व बैंक की भूराजनैतिक ऋण नीति ने नकदी फसलों के लिये ऋण देकर देशों में खाद्य पदार्थों की कमी पैदा कर दी है और उन्हें कमजोर बना दिया है।"
-- प्रोफेसर माइकल हडसन

अमेरिका की विदेश नीति हमेशा यह रही है कि अन्य देशों की खाद्य समृद्धि को खत्म कर उनकी आबादी को अपने अधीन कर ले ताकि उनकी ताकत बनी रहे ।
भारत और अन्य देशों के राजनेता जो अमेरिकी व्यापारसंघों के भूराजनैतिक स्वार्थों के ीन हैं जीएम खाद्य फसलों के खतरों के सबूतों को नजरअन्दाज करते रहते हैं। अमेरिका अन्य देशों में अपने लक्ष्य को पाने के लिये इन्ही आज्ञाकारी राजनेताओं पर निर्भर है।

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