Saturday, 7 November 2015

भ्रष्टाचार के बीज - भारत में खतरनाक अनावश्यक जीएम सरसों का प्रवेश



gm mustard
                                                           pic- sustainable pulse

कौलिन टौडहन्टर के लेख - http://www.colintodhunter.com/2015/11/seeds-of-corruption-unneeded-unwanted.html  का हिन्दी अनुवाद

भारत के वाणिज्यिक बाजार में प्रथम स्वीकृत जीएम खादय फसल के रूप में जीनांतरित (जीएम) सरसों के आने की संभावना बहुत नजदीक आ गई है । कई आधिकारिक रिपोर्टों द्वारा इसकी मनाही के बावजूद यह कार्यक्रम आगे बढ़ रहा है । तकनीकी विशेषज्ञ समिति (TEC) की रिपोर्ट चौथी आधिकारिक रिपोर्ट है जिसमें जीएम खाद्य फसलों के जोखिम का आकलन करने में बेइमानी, स्वतंत्रता और वैज्ञानिक विशेषज्ञता की कमी की बात कही गयी है ।

जीएम फसलों के खिलाफ चार रिपोर्ट इस प्रकार हैं -
-- फरवरी २०१० की `जयराम रमेश रिपोर्ट' जिसके द्वारा व्यवसायीकरण के लिये सर्वोच्च नियंत्रक की मंजूरी को पराजित कर बीटी बैगन पर अनिश्चितकालीन रोक लगा
-- अगस्त २०१२ की सोपोरी कमीटी रिपोर्ट
-- अगस्त २०१२ की स्थायी संसद समिति (पीएससी) की जीएम फसलों पर रिपोर्ट और
-- जून-जुलाई २०१३ की टीईसी की आखरी रिपोर्ट

टीईसी की सलाह है कि जब तक सरकार उचित नियामक और सुरक्षित क्रियाविधि का बंदोबस्त नहीं कर लेती है तब तक जीएम फसलों के क्षेत्र परीक्षण पर अनिश्चितकालीन रोक जारी रहना चाहिये।

प्रमुख प्रचारक अरुणा राड्रिग्स यह दलील पेश करती हैं कि सरकारी नियामकों ने जीएम सरसों की सच्चाई जनता और स्वतंत्र वैज्ञानिक समुदाय से छुपा रखा है जो कि संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ है। वह कहती हैं कि इसका एक ही मतलब हो सकता है - कि जैवसुरक्षा के लिये अनिवार्य और सतर्क दायित्वों को कार्यान्वित नहीं किया गया है जिसके कारण `सरसों डीएमएच ११' की सच्चाई छुपाने की जरूरत है।

राड्रिग्स का यह कहना है कि जीएम सरसों की सच्चाई को जिस तरह गुप्त रखा गया है उससेअधिनियम की भयावह स्थिति और भ्रष्टाचार का अंदाजा होता है। उनका यह निष्कर्ष है कि भारतीय कृषि में जीएम फसलों को शामिल करने के लिये देश की सरकार छलपूर्ण साधनों का इस्तेमाल कर रही है जिसमें विज्ञान और पारदर्शिता के लिये कोई स्थान नहीं है।

जीएम मुक्त भारत संघ यह मांग कर रहा है कि पर्यावरण, वन और जलवायु मंत्री प्रकाश जावड़ेकर फौरन जीएम सरसों के प्रसंस्करण और स्वीकृति पर रोक लगाने के लिये हस्तक्षेप करें और जीम सरसों की सुरक्षा परीक्षण संबन्धित सारी जानकारी को सार्वजनिक करें। एक समाचार रिपोर्ट की इस बात की पुष्टि करने पर कि जीएम सरसों के व्यवसायीकरण की मंजूरी का आवेदन पत्र सर्वोच्च नियामक संस्था जीईएसी (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में जीनांतरन मूल्यांकन समिति) की सहायता से किया गया है, जीएम मुक्त भारत संघ ने भारतीय सरकार को इसके गंभीर परिणामों की चेतना दी है।

जीएम मुक्त भारत संघ के संयोजक राजेश कृष्णन का कहना है कि जीएम सरसों के नस्ल इसलिये बनाये गये हैं ताकि बीज उत्पादन संस्थाओं का व्यवसाय बढे, जबकि किसानों के लिये पहले से ही गैर जीएम सरसों के संकर, साथ ही अधिक उपज वाले किस्म बाजार में मौजूद हैं। वह यह भी कहते हैं कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि गैर जीएम कृषि पारिस्थिकि जैसे कि सरसों के उत्पादन को बढाने के तरीके भी है जिससे दिल्ली विश्वविद्यालय के जीएम सरसों द्वारा अत्यधिक उत्पादन के किये गये दावे से कहीं अधिक उपज होती है।
कृष्णन कहते हैं -

" यह जीएम सरसों और भी कई जीएम खाद्य फसलों के लिये पिछले दरवाजे से प्रवेश करने का रास्ता है - जबकि कई समितियों ने भारत में जीएम फस्लों से संबन्धित कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका आधारित जाँच प्रक्रियाओं में शाकनाशी सहिष्णुता के खिलाफ सलाह दी है, यह जीएम सरसों शाकनाशी सहिष्णुता का इस्तेमाल करता है। अन्य सभी सरसों के किस्म सम्मिश्रण से बच नहीं सकते। भारत सरसों की विविधता का केन्द्र है। निश्चित रूप से यह एक और जीएम खाद्य फसल है जिसकी न तो हमें जरूरत है न ही हम चाहते हैं| किसानों और उपभोक्ताओं के चयन के अधिकार को छीनकर इसे हम नागरिकों पर जबरदस्ती डाला जा रहा है।"

अलायंस फार सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (एएसएचए या आशा) अर्थात संधारणीय व समग्र खेती संस्था की संयोजक कविता कुरुगंती भरसक प्रयत्न के बावजूद जीएम सरसों संबन्धित जैवसुरक्षा डेटा पाने में असफल रही हैं। वह कहती हैं -

"जीईएसी बडॅ ही रहस्यपूर्ण तरीके से काम कर रहा है। जबकि एक तरफ देश को यह नहीं पता कि नियामक संस्थाओं के अन्दर जीएम सरसों जैसे अर्जियों को लेकर क्या हो रहा है दूसरी तरफ जैवसुरक्षा डेटा की माँग को नियामकों द्वारा बार बार ठुकरा दिया जा रहा है।यह नियामक क्या छुपा रहे हैं और किसके हित में काम कर रहे है?"

कविता आगे पूछती हैं -

"नियमकों पर जैवसुरक्षा संबन्धित मूल्यांकन के लिये भरोसा क्यों किया जाय जब बीटी कपास और बीटी बैगन दोनो के मामले में सुप्रीम कोर्ट तकनीकी विशेषज्ञ कमिटी (एससी टीईसी) ने २०१३ में जैवसुरक्षा मूल्यांकन के नमूना विश्लेषण द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि वह उन जीएम फसलों की सलामती के बारे गलत थे?"

२००८ में आवेदकों के यह तर्क करने पर कि जबतक विषैलेपन और एलर्जी संबंधी डेटा जनता को बताया नहीं जाता है तबतक आवेदक और देश के चिन्तित वैज्ञानिक संबन्धित अधिकारियों के समक्ष प्रभाविक अभ्यावेदन करने की स्थिति में नहीं होंगे, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि जैवसुरक्षा डेटा को सार्वजनिक बनाया जाय।

२०१० में बीटी बैगन पर अनिश्चितकालीन रोक लगाया गया। उसके बारे नियामकों ने जनता की प्रतिक्रिया का अनुसरण किया और भारतीय सरकार ने बीटी बैगन की व्यवसायिक खेती के भविष्य पर अंतिम निर्णय लेने से पहले सार्वजनिक विचार विमर्श किया।

कविता कुरुगंती आगे कहती हैं --
" लेकिन ऐसा लगता है कि वर्तमान सरकार नियामक प्रक्रियाओं का संचालन गुप्त रूप से  करना चाहती है। अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिये हमारी पर्यावरण मंत्री से मिलने की माँग असफल रही। जैसे जैसे सरकार अधिक गोपनीय और विनियमों को लेकर अपारदर्शी होती जा रही है जनता को यह जानने का अधिकार है कि अगर सब कुछ सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से सही है तो उन्हें किस बात का डर है?"

दावा यह है कि जीएम सरसों पैदावार २५ से ३० प्रतिशत बढा देगा। मगर अरुणा राड्रिग्स का कहना है कि पैदावार में बढोतरी इन विशेष ट्रान्स्जीन के कारण नहीं है बल्कि सामान्य फसलों के जीन के संकरण का प्रत्यक्ष परिणाम है। उच्च उपज वाले सरसों की पैदावार को उनकी न बताकर जीएम सरसों की पैदावार बताना वास्तव में धोखा है।

वह कहती हैं कि बिल्कुल यही धोखा बीटी कपास को लेकर हुआ था जो भारतीय किसानों के लिये विनाशकारी साबित हुआ, फिर बीटी बैगन को लेकर दोहराने की कोशिश की गयी और अब सरसों को लेकर हो रहा है। राड्रिग्स कहती हैं कि यह बेजोड़ धोखा है और भारत में जीएम सरसों का मामला निरंतर नियामक अपराध का सबूत है।

जिस गोपनीयता और नियामक अपराधों की बात राड्रिग्स कर रही हैं वह भारतीय कृषि का पुनर्गठन कर उसे पश्चिम कृषि व्यवसाय कार्टेल (उत्पादक संघ) के लाभ के लिये उनके अधीन बनाने की योजना है। यह कंपनियाँ भारत को एक अरक्षनीय, औद्योगीकृत और विषैली खेती का नमूना अपनाने पर मजबूर कर रही हैं जो अंतहीन पेट्रो-रासायन आदानों, वस्तु फसलों और कार्पोरेशनों के बीज पर चलेगी।

http://www.globalresearch.ca/narendra-modi-and-monsanto-making-india-friendly-to-global-capital/5477428

यह पहले से ही किसानों को दरिद्र बनाकर उन्हे खेती से निकाल रहा है जिससे देश की खाद्य स्वतंत्रता पर ही नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर गहरा असर पडेगा।
http://www.globalresearch.ca/fast-food-nations-selling-out-to-junk-food-illness-and-food-insecurity/5434888

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